हजारीबाग : प्रस्तुत करना कोई गुनाह नहीं। मुख्य रूप से इसके विरोध की बात इसलिए हो रही है,क्योंकि सनातनी संस्कृति जिस प्रकार अपने लोगों द्वारा आहत हो रही है,यह चिंता का सबसे बड़ा कारण है। सनातनी परिवार आज एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। विधर्मी यदि कुछ हमें नुकसान पहुंचाते हैं तो यह अपने लोगों की देन है। अपने धर्म के अनुसार,अपने सनातन के मुख्य स्तंभ गौ,गंगा,ब्राह्मण,स्त्री आदि को सम्मान देना और उनकी रक्षा करना बतलाया गया है। पर,आज स्थिति बिल्कुल दयनीय है। रक्षा करना तो दूर की बात कुछ तथाकथित लोग अपने ही मां,बहन,बेटी आदि के साथ अत्याचार करने से बाज नहीं आते। उन्हें सताते हैं,उन पर जुल्म बरपाते हैं। जैसे उदाहरण स्वरूप यदि अपने लोगों से कहीं थोड़ी सी भी चूक हो जाए,तो उन्हें मार, गाली आदि अपशब्दों से छलनी कर देते हैं,लेकिन यदि विधर्मी हमारे भगवान की मूर्तियां तोड़ दे,गौ माता की हत्या कर दे,बहन बेटियों की हत्या, दुष्कर्म आदि बड़ी से बड़ी वारदात को अंजाम देदे,तब भी हम चुप रहते हैं।ऐसे में इसका विरोध करना तो दूर, सब कुछ जानते हुए भी इनके होठ सील जाते हैं। बल्कि इस पर अपने लोगों को ही दोषी ठहराते हैं। ये है हमारी असलियत। इन्हें लगता है की हम बोल कर क्यों विधर्मियों की नजर में आ जाएं। बल्कि ये नहीं समझ रहे हैं की अगला शिकार हम ही हैं। यदि आप पक्के हिम्मत वाले हो तो ऐसे विधर्मियों का विरोध कर के दिखा दो। ज्यादातर तो यह देखा गया है की कमजोर और असहाय लोगों पर लोग जुल्म बरपाकर हीरो बनने का काम करते हैं। और जहां बाप से भेंट हो जाए तो साइड से निकल जाते हैं। यदि बजरंग दल जैसी धर्म रक्षक संस्थाएं न रहें तो फिर सनातनियों का घर से बाहर निकलना भी मुस्किल हो जायेगा। असल देशभक्त तो ये लोग हैं, जो कांटों को चीरते हुए खतरों से खेलकर हमारी रक्षा करते हैं। इसके बावजूद भी हम इन्हें ही दोष देने से बाज नहीं आते। ऐसे में आप स्वयं समझ सकते हैं कि हमारी मानसिकता कितनी गिरी हुई है। यदि समय रहते हम अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं लाते हैं तो फिर हमें अपनी बर्बादी से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए भलाई उसी में है की अपने धर्म की रक्षा करने में तनिक भी पीछे न रहें। क्या आपने कभी सोंचा विधर्मी हमें बार-बार नुकसान क्यों पहुंचाते हैं? सीधा सा जवाब है,हमारी निष्क्रियता। जिस दिन हमारी निष्क्रियता सक्रियता में परिवर्तित हो जायेगी,उसी क्षण विधर्मी या तो कुत्ते की जिंदगी जीने को मजबूर होंगे या देश छोड़ जायेंगे। असल में हमारी निष्क्रियता ही हमें नुकसान पहुंचाने पर इन्हें बल प्रदान करती है। जिस दिन हम वास्तविक रूप से जग गए,ये हमारी कदमों में नजर आएंगे। हम खूब पूजा-पाठ करें और अपने धर्म को नहीं बचा सकें तो फिर ऐसे जीवन का क्या मोल है? यदि सच्चे सनातनी हैं तो अपनों पर जुल्म न बरपाएं,बल्कि अपनों की मदद करें। यही एक सच्चे सनातनी की पहचान है। अपने लोगों पर अत्याचार करना,ये कोई मरदांगी थोड़ी न है। मैंने अपने जीवन में यह संकल्प लिया है की अपने अंतिम सांस तक धर्म की रक्षा से पीछे नहीं हटूंगा। अपनो पर कभी भी अत्याचार नहीं करूंगा। असली यही कारण है की सनातन धर्मावलंबियों ने इस अंग्रेजी नव वर्ष को न मानने की अपील की है,ताकि हमारी अपनी संस्कृति पूर्ण रूपेण विशुद्ध हो सके और हम सुरक्षित जीवन जी सकें। कोई और दूसरा कारण नहीं है इसके विरोध का। हमारी भलाई के लिए ही ऐसा किया जा रहा है। हमारी निष्क्रियता को हटाने के लिए ऐसा करने को कहा जा रहा है,ताकि हम अब भी जग जाएं और इस जन्म को सफल बना सकें। नहीं तो फिर मानव और पशु में कोई शेष अंतर नहीं रह जाएगा। मानव जीवन का अर्थ क्या केवल इतना ही है की खाया-पिया और फिर मर गए। यह तो इस ब्रह्मांड में जन्मे हर जीव का गुण है। यदि ब्रह्मांड में जन्मे सभी जीव और हम एक हो गए,तो फिर हमारा विशेष महत्व क्या है? यह बड़ा ही महत्वपूर्ण विषय है। क्या हम धर्म को धोखें में जीने के लिए इस दुनिया में आए हैं? नहीं न। यादि हम धर्म को धोखें में जीते रहे तो फिर परमार्थ में हमारी पराजय तय है। हमें डूबने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए अब भी समय है अपने खून के साथ होली न खेलें,सावधान हो जाएं और चरित्र को जलने से बचाएं। जीवन का मुख्य उद्देश्य भी यही है की परमार्थ का मार्ग प्रशस्त करना। यदि हम अपनी नजरों के सामने अत्याचार की अग्नि को जलते देखें और उसे बुझाएं नहीं,तो फिर हम से बड़ा अत्याचारी कोई नहीं है। ये सारे पाप हमें ही सूद समेत भोगने को मजबूर होना होगा। तो तय आपको करना है की आप धर्म ध्वजरोहक बनेंगे या पाप कर्म से प्रवृत्त होंगे। हमें इससे कोई नहीं बचा सकता। यही इसके विरोध का मुख्य सार तत्व है।
