अमूल्य पारस के मूल्य पर विवाद। विरोध के स्वर में स्वाहा की ध्वनि




झारखंड के गिरिडीह जिले के पारसनाथ विवाद पर सटीक रचना।
आलेख दिवाकर पाठक, हजारीबाग झारखंड 

• अहिंसा और हिंसा के चक्रव्यूह में झारखंड।

• अमूल्य पारस के मूल्य पर विवाद। विरोध के स्वर में स्वाहा की ध्वनि।।

झारखंड। सूबे के गिरिडीह जिले का स्वर्ण सुसज्जित,सुहाना, मधुबन स्थित पारसनाथ इन दिनों विवादों की गूंज से गुंजायमान है। बताते चलें कि पारसनाथ पहाड़ी झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित एक पर्वत श्रृंखला है। यह प्रदेश का सर्वोच्च (1350 मीटर) शिखर है। साथ ही यह जैनियों का विश्व प्रसिद्ध महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक है। वे इसे सम्मेद शिखर कहते हैं। 23वें तीर्थंकर के नाम पर पहाड़ी का नाम पारसनाथ रखा गया। 24 में से 20 तीर्थकरों ने इस पहाड़ी पर मोक्ष प्राप्त किया। उनमें से प्रत्येक के लिए पहाड़ी पर एक मंदिर है। पहाड़ी पर कुछ मंदिर 2000 साल से अधिक पुराना माना जाता है। हालांकि यह जगह प्राचीन काल से बनी हुई है। वहीं संथालियों के देवता मारंग बुरू भी यहां हैं। वे वैशाख में पूर्णिमा दिवस पर एक शिकार त्यौहार मनाते हैं। 



   अब हम वर्तमान में हो रहे इस स्थल पर विवाद की पूरी दास्तां को दर्शाते हैं। क्या है मामला? जैन समाज वर्ष 2019 में केंद्र व राज्य सरकार द्वारा जारी एक-एक अधिसूचना का विरोध कर रहा है। केंद्र ने 2 अगस्त 2019 की अधिसूचना जारी कर पारसनाथ के एक भाग को इको सेंसेटिव जोन के रूप में घोषित कर दिया था। जिसके तहत वहां इको टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा सकता था। वहीं राज्य सरकार ने 22 फरवरी 2019 को अधिसूचना जारी कर पारसनाथ को अंतरराष्ट्रीय महत्व का पर्यटन स्थल घोषित कर दिया। जैन समाज का कहना है कि पर्यटन क्षेत्र घोषित होने से वहां मांस-मदिरा का उपयोग होना शुरू हो जाएगा। हालांकि,राज्य सरकार का कहना है कि वहां छोटी- मोटी सुविधाएं बहाल करने के लिए पर्यटन क्षेत्र घोषित करना जरूरी था। इस पर जैन समाज ने देश के अलग-अलग जगहों पर प्रदर्शन किए। प्रदर्शन के दौरान दो जैन मुनियों का निधन हो गया। इसके बाद केंद्र व राज्य सरकारों ने पर्यटन गतिविधियों पर रोक लगाते हुए उसे धार्मिक पर्यटन क्षेत्र के रूप में घोषित करने को तैयार है। इसके तहत यहां पर इन गतिविधियों की नहीं होगी अनुमति। 1: तेज संगीत बजाना 2: लाउडस्पीकर का उपयोग करना 3: पवित्र स्थल, स्मारक, मंदिर, झीलें, चट्टानें, गुफाएं,पौधों एवं जानवरों को नुकसान पहुंचाने वाले कार्य 4: पालतू जानवरों के साथ प्रवेश।
           इस अधिसूचना के तुरंत बाद आदिवासियों का धर्मगढ़ मरांग बुरु पारसनाथ पर्वत पर अपने अधिकार को लेकर पारसनाथ बचाओ संघर्ष समिति के आह्वान पर मधुबन स्थित हटिया मैदान में आदिवासियों और मूल वासियों का महाजुटान हुआ। पारसनाथ बचाओ। मरांग बुरु हमारा है,के नारों के साथ आक्रोश पूर्ण रैली निकाली गई और प्रदर्शन किया गया। इस दौरान प्रदर्शनकारी केंद्र व राज्य सरकार समेत स्थानीय विधायक सुदिव्य कुमार सोनू के खिलाफ नारेबाजी करते देखे गए। रैली में कई लोग अपने हाथों में पारंपरिक हथियार लिए हुए थे। प्रदर्शन में पुरुष,महिला सहित युवाओं की बड़ी संख्या थी। प्रदर्शन में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का पुतला दहन कर,विरोध दर्ज किया गया। साथ ही हुक्मरानों के मुर्दाबाद के नारे लगे। प्रदर्शन में झारखंड,बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल से काफी संख्या में आदिवासी और मूलवासी पहुंचे थे। इसके बाद पारसनाथ बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक सिकंदर हेंब्रम सहित पूर्व सांसद सलखन मुर्मू,बोरियो विधायक लोबिन हेंब्रम,पूर्व शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव और झारखंड खतियानी भाषा संघर्ष समिति के नेता जयराम महतो ने सभा को संबोधित किया। संबोधन में सभी ने अपनी अलग-अलग राय रखी पर मकसद एक ही था। सबों की राय जानने से पहले गिरिडीह विधायक सुदिव्य कुमार सोनू की बात पर गौर करें। उन्होंने कहा कि 8 जनवरी को हुई बैठक में ही गतिरोध समाप्त कर दिया गया है। इस बैठक में जिला प्रशासन के साथ आदिवासी संथाल समाज के प्रतिनिधि,जैन समाज के प्रतिनिधि,व कई अन्य प्रतिनिधियों की उपस्थिति में आदिवासी और मूलवासी की भी समस्या का समाधान किया गया है। यह स्पष्ट कर दिया गया है कि आदि काल से चली आ रही परंपरा में ना कोई चीजें जोड़ी जाएंगी और ना ही घटाई जाएगी। आगे उन्होंने कहा कि पारसनाथ पर्वत पर मरांग बुरु थे,हैं और रहेंगे। सांसद सालखन मुर्मू ने कहा कि जैन धर्मावलंबियों ने हमारे ईश्वर पर कब्जा करने के लिए देश भर में आंदोलन किया और केंद्र व राज्य सरकार पर दबाव बनाया। इसके खिलाफ हमलोग को एकजुट होकर अपनी मरांग बुरु की रक्षा करनी होगी। इस पर्वत पर पहला अधिकार आदिवासियों का है। हेमंत सोरेन की सरकार आदिवासी की सरकार है,लेकिन स्थानीय विधायक आंदोलन को तोड़ना चाह रहे हैं। यह मामला गिरिडीह और राज्य का नहीं, बल्कि देश का है। बोरियो विधायक लोबिन हेंब्रम ने कहा कि लोगों को विश्वास था कि अबुआ सरकार बनेगी तो विकास होगा,लेकिन कुछ भी नहीं हो रहा है। 24 फरवरी को मरांग बुरू को बचाने के लिए झारखंड बंद रहेगा। चरणबद्ध आंदोलन कर ट्रेलर दिखाया जाएगा। इसके बाद राजधानी रांची में फिल्म दिखाएंगे। अपनी ही सरकार में अधिकार के लिए भीख मांगनी पड़ती है। 25 जनवरी तक आदिवासी-मूलवासी को अधिकार नहीं मिला तो हमलोग आईना दिखा देंगे। आवाज उठाने पर उन्हें धमकी दी जाती है कि टिकट नहीं मिलेगा। हेमंत सोरेन हमें पार्टी से हटा सकते हैं,माटी से नहीं। पूर्व शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव ने कहा कि आदिवासी प्रकृति का पूजक रहा है। जहां से हमारी आस्था है,वह मरांग बुरु हमारा है। राज्य में सीएनटी एसपीटी एक्ट का उल्लंघन हो रहा है। हमें अपनी विरासत को बचाए रखना है। राज्य से लेकर केंद्र सरकार अगर अभी विचार नहीं करती तो हम चुप नहीं बैठेंगे। जो भी जनप्रतिनिधि हमारे साथ धोखा करेगा उन्हें सबक सिखाना होगा। झारखंड खतियानी भाषा संघर्ष समिति के नेता जयराम महतो ने कहा कि किसी भी सर्वे में जैन समाज का 1 फीट जमीन नहीं है। क्षेत्र के 50 गांव के लोग प्रतिदिन फल,फूल,पत्ता लेकर बाजार में बेचते हैं। यहां हम सदियों से वास करते हैं। जैन समुदाय ने सीएनटी एक्ट का उल्लंघन किया है। कुल मिलाकर सभी ने एक ही बात कही,पारसनाथ हमारा है। हम इसकी लड़ाई जारी रखेंगे। अंतर्राष्ट्रीय संथाल परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष नरेश मुर्मू ने दावा किया है कि अगर सरकार मरांग बुरू को जैनियों के चंगुल से मुक्त करने में विफल रही तो पांच राज्यों में विद्रोह होगा। सरकार दस्तावेजीकरण के आधार पर कदम उठाए। वर्ष 1956 के राज्य पत्र में इसे मरांग बुरू के रूप में उल्लेख किया गया है। जैन समुदाय अतीत में पारसनाथ के लिए कानूनी लड़ाई हार गया था। संथाल जनजाति देश के सबसे बड़े अनुसूचित जनजाति समुदाय में से एक है,जिसकी झारखंड,बिहार, उड़ीसा,असम और पश्चिम बंगाल में अच्छी खासी आबादी है और यह प्रकृति पूजक हैं। मुर्मू ने दावा किया कि परिषद की संरक्षक स्वयं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और इसके अध्यक्ष असम के पूर्व सांसद पी मांझी हैं। 
   अब हम हुक्मरानों के बोल को प्रस्तुत करते हैं। केंद्रीय पर्यटन मंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा कि झारखंड में अपने पवित्र स्थल की सुरक्षा की मांग कर रहे जैन समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। रेडी नहीं कहा था कि केंद्र सरकार पहले ही इस मुद्दे को झारखंड सरकार के सामने उठा चुकी है और उन्होंने खुद इस मुद्दे को उठाते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखा है। इस पर मुख्यमंत्री जी ने कहा है कि सम्मेद शिखर की पवित्रता बनाए रखने को राज्य सरकार प्रतिबद्ध है। 
       अब हम प्राक् इतिहास की पृष्ठभूमि को प्रस्तुत करते हैं। शिखर जी की प्राचीन तलहटी पालगंज में स्थित थी। प्राचीन काल में पाताल गढ़ के नाम से जाना जाने वाला पालगंज का गद्दी हजारीबाग क्षेत्र में खड़गड़िहा गद्दी का एक हिस्सा था। गद्दी पर बघेल क्षत्रिय का शासन था जिसे पालगंज राजा के नाम से जाना जाता था। 16 वीं शताब्दी में मुर्शिदाबाद के जगत सेठ के रूप में जाना जाने वाला उल्लेखनीय श्वेतांबर जैन बैंकरों ने मुगल सम्राटों के फरमानों के आधार पर शिखरजी पहाड़ी के अधिकारों को हासिल कर लिया था। 17 वीं सदी में जगत सेठ ने पालगंज के राजा को एक पत्र जारी कर उन्हें शिखरजी का रखवाला नियुक्त किया। 18 वीं शताब्दी में शिखरजी पहाड़ी को पालगंज के राजा को सौंप दिया, जिसने एक कानूनी धारणा बनाई कि यह उनकी संपत्ति थी। पालगंज दिगंबर जैन मंदिर में श्वेतांबर मान्यताओं के अनुसार श्री पार्श्वनाथ भगवान की पूजा की जाती है। दिलचस्प बात यह है की मूर्ति को मधुबन शहर में स्थानांतरित करने के लिए कई प्रयास किए गए। हालांकि, मूर्ति ने वर्तमान स्थान से हिलने से इंकार कर दिया। 
        अब हम दोनों समुदायों के विरोध के बोल को प्रस्तुत करते हैं। इस दौरान हमने कई जैन और आदिवासियों से बात करी। जैनों ने कहा,हमें आदिवासी भाइयों से कोई एतराज नहीं है। उनके प्रकृति देव मरांग बुरु यहां है। वे सभी उनकी पूजा करें। केवल हमारी पवित्रता को बनाए रखने में हमारा साथ दें। हम अहिंसावादी विचारधारा के हैं। हिंसा का नाम लेना भी हमारे लिए पाप है। ऐसे कोई भी धर्म ग्रंथ हिंसा की वकालत नहीं करता। केवल इसमें हमारी भावनाओं की कद्र करें। वहीं आदिवासियों ने कहा कि मरांग बुरू हमारा है। हम अपनी पूजा में जीवों की बलि देते हैं। जैन के दलालों होश में आओ। जैनियों ने हमारी जमीन हड़पने का काम किया। उनसे हमारा कल्चर मेल नहीं खाता। हम जीवों की बलि को प्रधान मानते हैं। 
    कुल मिलाकर सारांश है कि सूबे में इन दिनों हिंसा और अहिंसा का चक्रव्यूह तैयार है। जिसका भेदन केंद्र व सूबे सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या सरकारें इस चक्रव्यूह का भेदन कर अभिमन्यु के रूप में स्वयं को स्थापित कर पाएंगी? क्योंकि सूबे का पारसनाथ इन दिनों अहिंसा और हिंसा की धर्म संकट की अग्नि में हवन होने को तैयार है। अर्थात् सभी की अपनी-अपनी परंपराओं पर प्रश्नचिन्ह कायम है। सूबे का यह अमूल्य पारस जिसमें स्वर्ण निर्माण की अमित शक्ति प्राप्त हो,आज अपनी मूल्य पर आंसू बहाता दिख रहा है। अर्थात् अमूल्य पारस के मूल्य का यह विवाद एक भयावह भंवर को जन्म दे रहा है,जिसमें एक-दूसरे की जन भावनाएं दुर्घटनाग्रस्त होती दिख रही हैं। हर ओर विरोध के स्वर में स्वाहा की ध्वनि सुनाई दे रही है। क्योंकि जिस प्रकार एक कट्टरता पूर्ण आक्रोश भरा विरोध के बाजे बजाए जा रहे हैं। यह एक गंभीर चिंता का विषय है,जिसका निदान हर हाल में समतुल्य होना चाहिए। क्योंकि किसी की भी भावनाओं की हत्या करना अच्छी चीज नहीं। कोई भी समस्या गंभीर नहीं होती,अपितु उसे गंभीर बनाया जाता है। यदि हम आग में घी डालने का काम करेंगे,तो जाहिर सी बात है कि वह कभी ठंडी हो ही नहीं सकती। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने संपूर्ण जीवन में यह कोशिश करनी चाहिए कि विवाद का कभी जन्म ही ना हो। यदि किसी प्रकार से जन्म हो भी जाए,तो उसकी हत्या कर देनी चाहिए। इसी में सबकी भलाई है। यहां भी विवाद की कोई बात नहीं है। जबरन मामले को तूल देने का कार्य किया जा रहा है। दरअसल यह विवाद नासमझी की वजह से जोर पकड़ने लगा। जब एक नन जैनी को पर्वत पर जाने से रोका गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि हम यहां पले-बढ़े हैं। हम सभी इन्हीं जंगलों की आबो हवा में जीते आए हैं और हमें ही वहां जाने से रोक दिया जाए। उनका भी कहना बिल्कुल सार्थक है। मानवता की मानें तो प्राकृत चीजों पर किसी का व्यक्तिगत अधिकार नहीं होता। सभी प्रकृति पुत्र हैं। इसलिए भाईचारगी के साथ जीवन जीने के मूल मंत्र से दीक्षित हों। ऐसे ही कुछ लोगों ने इस पूरी घटना को भड़काने का काम किया है। ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। नहीं तो अशांति की अग्नि जलाकर,शांति को जला डालेंगे। जैन भाइयों को भी आदिवासी भाइयों की भावनाओं का कदर करना होगा। इसलिए अफवाहों पर ध्यान ना दें। दोनों एक-दूसरे की भावना का ख्याल रखें। भाईचारगी का परिचय दें। क्योंकि हम सभी मानवता के पूजक हैं। मानव हित से बड़ा कोई धर्म नहीं। और सिद्धांत कहता है कि धर्म को धोखे में ना जिया जाए। ऐसे भी हमारे देश में जल और वनस्पतियां आदि को नैवेद्य की वस्तु मानी जाती हैं,तो ऐसे में उसकी पवित्रता का ख्याल हम सभी को रखना होगा। जरा गौर करें,आखिर अब तक निर्विवाद यहां कार्य कैसे चलता रहा? जाहिर सी बात है कि आपसी भाईचारे की वजह से चलता रहा। दोनों ने एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखा। अचानक से इस तरह की गंभीर विवाद का जन्म लेना,एक गंभीर प्रश्न को इंगित करता है। एक सोची समझी साजिश की ओर इशारा करता है। इसलिए समझदार के लिए इशारा काफी है। जिसका हल हम सभी को अपने मन मस्तिष्क से करने की जरूरत है। इसी में संपूर्ण समाधान समाहित है। यह एक महत्वपूर्ण विषय है,जिसे हम सब को याद रखने की जरूरत है। विवाद के बीज जन्म नहीं लेते,बल्कि बोए जाते हैं। जिसमें सामने वाला साजिश कर्ता हमें आपस में लड़ाकर अपनी रोटी सेंकता है। इसलिए सदैव अपना खयाल रखें। सजग रहें,सावधान रहें और साजिश वाली संक्रमण से बचे रहें। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक सच्चे संत और एक सच्चे ग्रंथ को अपनाना चाहिए। जो हमारी दुर्घटनाओं के द्वार को बंद करते हैं। हमें कुमार्गी होने से बचाते हैं। यही जीवन का मुख्य सार तत्व है।

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