प्राची से सूरज निकलेगा, तोड़ अंधेरों की परतें,
घर–घर देना जिन्हें उजाला, कौन थोप सकता शर्तें।
श्रम के बीज जिन्हें बोना है, कहां देखते धूप औ छांव,
उठा कुदाली निकल पड़ेंगे, थक कर ही आयेंगे गांव।
मत देखो की धूप बहुत है, मत देखो सबकुछ प्रतिकूल,
जिन्हें शिखर तक चढ़ना होगा, कर लेते वे सब अनुकूल।
देती राह उन्हें बाधाएं, कांटें बन जाते पाथेय,
कहां खोजते मार्ग सुगम वे, विघ्न उन्हें देते है श्रेय।
केवल पथिक नहीं चलता है, उत्सुक हो आता है लक्ष्य,
प्रमुदित होकर बांह पसारे, तुम्हें निहारे खड़ा समक्ष ।
खड़ी छांव है वहीं सामने, जहां धूप में पांव जले,
बदली लेकर गहन जोहता, आओ मेरे छांव तले।
उठो, ध्वंस से रचो नया कुछ, टहनी में कोपल आए,
बीत गए रूखे –सूखे दिन, तिनके ले पंछी आए।।
- अशोक मिश्र, प्रधानाचार्य
- इंटर कॉलेज, प्रताप गंज, जौनपुर,