• महिला कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधिमण्डल से मिलने में राष्ट्रीय महिला आयोग अध्यक्षा और अन्य सदस्य आयोग में अनुपलब्धता खेदजनक: केवाईएस
• आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े महिलाओं और बच्चों पर बढ़ रही यौन हिसा व हत्या की घटनाओं पर राष्ट्रीय महिला आयोग की चुप्पी दुर्भाग्यपूर्ण: केवाईएस
• आयोग को ज्ञापन जमा कर बिलकिस बानो के बलात्कारियों की रिहाई के खिलाफ तत्काल कदम उठाने की मांग की!
• बलात्कार पीड़ितों को न्याय और सहायता सुनिश्चित करने के लिए निर्भया कोष के तत्काल उपयोग की मांग!
नई दिल्ली : क्रांतिकरी युवा संगठन (केवाईएस) के महिला कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधिमंडल ने महिलाओं और बच्चों पर हो रहे यौन हिंसा के बढ़ते मामलों के संबंध में राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष को एक ज्ञापन सौंपने पहुंचा, किन्तु अध्यक्षा और अन्य सदस्यों की अनुपलब्धता रहे| प्रतिनिधिमंडल से मिलने में राष्ट्रीय महिला आयोग अध्यक्षा और अन्य सदस्यों की अनुपलब्धता पूर्ण रूप से खेदजनक हैं| अंतत सदस्यों ने अध्यक्षा के निजी सहायक को अपना ज्ञापन जमा किया|
ज्ञात हो कि देश भर में आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े महिलाओं और बच्चों पर यौन हिसा, बलात्कार व हत्या की घटनाओं के कई मामले सामने आए हैं| 18 अगस्त को गाजियाबाद में अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की दो नाबालिक लड़कियों का अपहरण एक 25 वर्षीय व्यक्ति किया। उसने दोनों लड़कियों के साथ बलात्कार किया और दोनों में से एक को मार डाला। दूसरी पीड़िता मारने से पहले भागने में कामयाब रही। एक दूसरे मामले में, पंजाब के मोगा की एक 18 वर्षीय दलित महिला का तीन नाबालिगों ने बलात्कार किया। युवती एक बास्केटबॉल खिलाड़ी है और 12 अगस्त को तीनों आरोपियों ने बलात्कार के बाद एक इनडोर स्टेडियम की 25 फुट ऊंची छत से धक्का दे दिया। पीड़िता की कई सर्जरियाँ हुई और उसके खेल-कैरियर की संभावनाएँ न के बराबार है। अभियुक्तों को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है| पीड़िता के पिता ने आरोप लगाया है कि पुलिस ने अभियुक्तों पर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों (अत्याचारों की रोकथाम) अधिनियम, 1989 के नियमों तहत कार्रवाई करने से इनकार कर दिया।
इस महीने की शुरुआत में, अयोध्या के पास एक गाँव के दो दलित बहनों को उनके गाँव के तीन लोगों द्वारा कथित तौर पर अपहरण कर उनके साथ बलात्कार लिया गया। पीड़िताओं में से एक नाबालिग है। पीड़िताओं के परिवार ने आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस ने पहले मामले को रफादफा करने की कोशिश की लेकिन आखिरकार दबाव के बाद ही एफआईआर दर्ज करना पड़ा।
देश में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ लगातार बढ़ रहे बलात्कार और यौन हिंसा के मामलों का भयावह सच भी इन घटनाओं से पूरी तरह बयान करना संभव नहीं| | बलात्कार के बाद पीड़िता के साथ हो रहे हत्या की बारदातों के मामले और भी ज्यादा चिंतित करने वाले हैं। इन घटनाओं की जाँच करने से पता चलता है कि अपराधी और न्याय प्रणाली के बीच साँठगाँठ लगातार बढ़ रही है, जिससे न्याय मिलना दूभर हो चला है| न्याय प्रक्रिया की लापरवाही से अपराधियों को बढ़ावा मिल रहा है, और उनमें यह प्रवृत्ति विकसित हो रही है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों और जातिय समुदायों की महिलाओं व बच्चों के खिलाफ ऐसी वारदातों पर सरकार और राज्य व्यवस्था उनके पक्ष में खड़ी है, तथा वे दंड से बच निकल सकते हैं|
2002 के बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार मामले में 11 दोषियों की समयपूर्व रिहाई का मामला भी महिला अधिकारों और न्यायिक प्रणाली के इतिहास में बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है| 2002 गुजरात सांप्रदायिक हिंसा के दौरान रिहा किए गए 11 आरोपियों द्वारा बिलकिस बानो, जिनकी उम्र 21 वर्षीय महिला थी, उनकी मां और तीन अन्य महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था। इस नृशंस हमले के समय, बिलकिस पांच महीने की गर्भवती थी। दोषियों ने उनकी 3 साल की बेटी सालेहा सहित उसके परिवार के सात सदस्यों की हत्या कर दी थी। दाहोद जिले में सांप्रदायिक घृणा से पूर्ण इस घटना को तब अंजाम दिया गया जब बिलकिस व उनका परिवार दंगों से बचने की कोशिश कर रहे थे, जहाँ 20-30 लोगों के एक समूह ने उन पर हमला किया। 11 दोषियों को रिहा कर गुजरात सरकार ने रिहाई के संबंध में बनाई नीति का उल्लंघन किया है, जिसमे उल्लेखित है कि बलात्कार/सामूहिक बलात्कार के आरोपियों की शीघ्र रिहाई की अनुमति नहीं है| यह निर्णय आज के भारत में महिला सुरक्षा की संभावनाओं के बारे में गंभीर सवाल खड़ा करता है, खासकर हाशियाई और पिछड़े समुदायों से सम्बद्ध जनों के लिए भारी चिंता का विषय है। जहाँ सरकार द्वारा, एक तरफ आजादी का अमृत महोत्सव मनाने का आहवाहन किया जा रहा है वहीं सक्रिय रूप से सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा दिया जा रहा है|
अपराधियों और न्यायिक प्रणाली के स्तंभों जैसे पुलिस इत्यादि की आपराधिक ढिलाई के कारण बलात्कारियों को बढ़ावा मिल रहा है, तथा अधिकारों के उल्लंघन और अन्याय की इन घटनाओं में वृद्धि हुई है। पिछले लंबे से आयोग ने सक्रिय भूमिका निभाने के बजाय नौकरशाही और चुप्पी का रवैया अपनाया है| इस चुप्पी ने ही अधिकारियों को अपराधियों से सांठगांठ कर मामलों को दबाने और पीड़ितों को चुप करने की मुक्ति दी है| आयोग की चुप्पी अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों के पूरा करने में आयोग की अक्षमता का परिचायक है|
आयोग को सौंपे गए ज्ञापन में केवाईएस ने मांग की है कि बलात्कार के मामलों में एफआईआर दर्ज करने में देरी के लिए जीरो टॉलरेंस का रुक अख्तियार किया जाना चाहिए| एफआईआर दर्ज करने में देरी का पीड़ित और परिवार जनों को परेशान करने वाले पुलिस कर्मियों को सेवा से बर्खास्त किया जाना चाहिए और सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। युवा संगठन ने यह भी मांग की कि आयोग सुनिश्चित करे कि इन और बलात्कार के अन्य मामलों में अपराधियों को जल्द से जल्द न्याय के दायरे में लाया जाए। बिलकिस बानो मामले में 11 बलात्कारियों और हत्यारों की छूट का मुद्दा उठाते हुए, संगठन ने मांग की है कि आयोग को गुजरात सरकार को रिहाई का फैसला रद्द करने हेतु सख्त सिफारिश भेजें|
बलात्कार और यौन अपराधों के शिकार महिलाओं और बच्चों की न्याय के संबंध में केवाईएस ने मांग की है कि आयोग सुनिश्चित करे कि निर्भया फंड जिसका 90 प्रतिशत अभी भी उपयोग नहीं किया गया है, उसका उचित उपयोग किया जाए| केवाईएस संकल्प लेता है इन घटनाओं के खिलाफ अपने संघर्ष जारी रखेगा|
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