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| तस्लीमुद्दीन साहब! आपकी रूह से मुझे कुछ कहना है… |
लेखक: मिन्हाज अहमद क़ासमी, चेयरमैन ऑल इंडिया सीमांचल जन विकास परिषद
सीमांचल को अधूरे ऐलानों से ज्यादा मुकम्मल कामों की जरूरत है। आपने नेताओं की फौज बनाई, मगर समाज को एक साझा मंच क्यों नहीं दिया? तस्लीमुद्दीन साहब, मुझे याद आता है कि आपने कई लोगों को आगे बढ़ाया। आपके साथ रहकर अनेक लोगों ने सियासत सीखी, अपनी पहचान बनाई और समाज में जगह हासिल की। लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि उस अनुभव को किसी एक परिवार या गुट की सीमा से बाहर निकालकर समाज की सामूहिक पूंजी बनाया जाए। मेरा सवाल यह है कि क्या हम ऐसा कोई मजबूत संस्थागत ढांचा बना सके, जहां नए नौजवानों को नेतृत्व की ट्रेनिंग मिले? जहां उन्हें संविधान की जानकारी हो, प्रशासन से संवाद करने का सलीका आए, बजट समझने की क्षमता पैदा हो, सरकारी योजनाओं की निगरानी करना सीखें और समाज के लिए काम करने का व्यावहारिक अनुभव हासिल करें? हमारे यहां अक्सर ऐसा होता है कि कुछ नौजवान चाय की दुकानों पर बैठकर बड़े-बड़े सियासी दावे करते हैं। वे सरकारों को बदलने और नेताओं को चुनौती देने की बातें करते हैं। लेकिन जब वास्तविक जिंदगी में किसी दफ्तर के सामने अपने समाज का सवाल रखने की बारी आती है, तो बहुत से लोग पीछे हट जाते हैं। यह केवल नौजवानों की गलती नहीं। यह हमारी सामाजिक और शैक्षणिक व्यवस्था की भी जिम्मेदारी है। हमने उन्हें बहस करना तो सिखाया, मगर दस्तावेज पढ़ना, कानून समझना, आवेदन लिखना, आंकड़े जुटाना, अधिकारियों से जवाब मांगना और लगातार संघर्ष करना कितना सिखाया?
हमें नारों से आगे बढ़कर ज्ञान, संगठन और जिम्मेदारी की संस्कृति पैदा करनी होगी। तस्लीमुद्दीन साहब, आपके अधूरे ख्वाब कौन पूरे करेगा? आपके सियासी सफर की अपनी खूबियां थीं और अपनी सीमाएं भी। संसद में सवाल उठाने का तरीका हो या सत्ता के लोगों से व्यक्तिगत संपर्क के जरिए काम निकलवाने की कोशिश—आपकी कार्यशैली पर अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन आज असली सवाल यह है कि आपके अनुभव से अगली पीढ़ी क्या सीख रही है? सियासत केवल किसी बड़े नेता से मुलाकात कर लेने का नाम नहीं है। सियासत यह भी है कि गांव में स्कूल चले, अस्पताल में डॉक्टर उपलब्ध हों, सड़क टिकाऊ बने, बाढ़ से प्रभावित परिवारों को राहत मिले, नौजवानों को रोजगार मिले और गरीब को सरकारी दफ्तर में अपना हक मांगने के लिए किसी रसूखदार की सिफारिश न ढूंढ़नी पड़े। मैं चाहता हूं कि आपकी विरासत से जुड़े लोग एक साझा विकास एजेंडा तैयार करें। परिवार के सदस्य हों या पुराने साथी, सबको बैठकर तय करना चाहिए कि अगले पांच साल में सीमांचल के लिए कौन-कौन से काम प्राथमिकता पर होंगे।
आपके परिवार में कोई सांसद बने, कोई विधायक बने, कोई संगठन चलाए—यह सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनता के फैसले से तय होना चाहिए। मगर जो भी जिम्मेदारी संभाले, वह दूसरे की राह रोकने के बजाय समाज की राह आसान करे।
अगर किसी के पास अनुभव है, तो वह नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करे। अगर किसी के पास संसाधन हैं, तो वह संस्थान बनाने में सहयोग करे। अगर किसी के पास राजनीतिक पहुंच है, तो उसका इस्तेमाल सार्वजनिक हित के लिए हो। कुर्सियां बदल सकती हैं, मगर कौम के बुनियादी सवाल नहीं बदलने चाहिए। कुल्हैया समाज को आखिर कब मिलेगा अपना मजबूत सामाजिक नेतृत्व? तस्लीमुद्दीन साहब, यह सवाल आपके परिवार से आगे बढ़कर हमारी पूरी बिरादरी से है। हम अपनी सामाजिक कमजोरियों के लिए केवल किसी एक नेता को जिम्मेदार ठहराकर मुक्त नहीं हो सकते। हमारे पढ़े-लिखे नौजवानों में से बहुत से लोग बेहतर भविष्य की तलाश में बाहर चले जाते हैं। यह अच्छी बात है कि वे तरक्की करें, लेकिन सवाल यह भी है कि अपने इलाके से उनका रिश्ता कैसे कायम रहे? वे अपने अनुभव, ज्ञान और संसाधनों से सीमांचल के लिए क्या योगदान दे सकते हैं?।हमें ऐसे शिक्षक चाहिए जो बच्चों की शिक्षा के लिए काम करें। ऐसे वकील चाहिए जो लोगों को उनके अधिकार समझाएं। ऐसे पत्रकार चाहिए जो तथ्यों के साथ जनसमस्याएं उठाएं। ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता चाहिए जो सरकारी योजनाओं की निगरानी करें। ऐसे नौजवान चाहिए जो पंचायत से लेकर जिला और राज्य स्तर तक जनता की समस्याओं पर अध्ययन करें।
और सबसे बढ़कर, हमें ऐसे रहनुमा चाहिए जो समाज को अपने पीछे चलाने के बजाय समाज को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहें। मैं कुल्हैया समाज के लोगों से भी कहना चाहता हूं कि अपनी पूरी उम्मीद किसी एक खानदान, किसी एक नेता या किसी एक चुनाव पर मत टिकाइए। अपना संगठन बनाइए, शिक्षा पर निवेश कीजिए, स्थानीय संस्थाएं खड़ी कीजिए और नौजवानों को जिम्मेदारी दीजिए। एक शायर का मशहूर शेर है— “मुत्तहिद हो तो बदल डालो निज़ाम-ए-गुलशन, मुंतशिर होगे तो मरो शोर मचाते क्यों?” यह शेर हमें याद दिलाता है कि बिखरी हुई आवाजें अक्सर अपनी ताकत खो देती हैं। इत्तेहाद का मतलब किसी एक व्यक्ति की हर बात मान लेना नहीं, बल्कि मतभेदों के बावजूद साझा उद्देश्यों पर एक साथ काम करना है।
आखिरी सवाल—आपकी रूह को सुकून किसमें मिलेगा?
तस्लीमुद्दीन साहब! आज मैंने अपने दिल की बात कह दी। हो सकता है मेरी कुछ बातों से लोग असहमत हों। हो सकता है आपकी सियासत के प्रशंसकों को मेरी शिकायतें सख्त लगें। लेकिन मेरा मकसद किसी की तौहीन करना नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाना है जो सीमांचल के भविष्य से जुड़े हैं। मैं आपके राजनीतिक योगदान को नकारने नहीं आया हूं। मैं यह पूछने आया हूं कि उस योगदान को स्थायी सामाजिक बदलाव में कैसे बदला जाए। आपकी अगली नस्ल के सामने आज एक रास्ता है—आपसी मतभेदों में उलझकर अपनी ऊर्जा खर्च करे, या आपके अनुभव से सीखकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक एकता के नए अध्याय लिखे। मेरी गुजारिश है कि अगर आपके परिवार के बीच कोई मतभेद हैं, तो उन्हें बातचीत से सुलझाया जाए। अगर आपकी कोई अधूरी योजना है, तो उसकी समीक्षा की जाए। अगर कोई संस्थान बंद या निष्क्रिय है, तो उसे फिर से जनता के काम लाने की कोशिश हो। और अगर कुल्हैया समाज में नेतृत्व का अभाव महसूस किया जा रहा है, तो नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए ठोस पहल की जाए। मैं नहीं जानता कि मरहूम तस्लीमुद्दीन साहब की रूह से शिकायत करने का मेरा यह अंदाज कितना सही है। मगर इतना जरूर जानता हूं कि जिंदा लोगों से सवाल करना हमारा हक है और आने वाली नस्लों के लिए बेहतर व्यवस्था बनाना हमारी जिम्मेदारी।
तस्लीमुद्दीन साहब, आपने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ कमाया। अब वक्त है कि उस विरासत को केवल नाम, परिवार और सियासी प्रभाव तक सीमित न रहने दिया जाए। उसे स्कूलों, अस्पतालों, पुस्तकालयों, प्रशिक्षण केंद्रों और एक जागरूक समाज की शक्ल दी जाए।
आपके नाम की सबसे बड़ी इज्जत यह नहीं होगी कि लोग हमेशा आपके परिवार का नाम लेते रहें; बल्कि यह होगी कि सीमांचल का हर गरीब बच्चा पढ़ सके, हर जरूरतमंद को इलाज मिल सके और कुल्हैया समाज का हर नौजवान अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझ सके।
अल्लाह मरहूम तस्लीमुद्दीन साहब की मगफिरत फरमाए और उनके परिवार तथा सीमांचल के लोगों को बेहतर रास्ता चुनने की तौफीक अता फरमाए।
आमीन।
