60 साल की सियासत, अधूरी विरासत और नेतृत्व की तलाश में सीमांचल की एक बेबस क़ौम

तस्लीमुद्दीन साहब! आपकी रूह से मुझे कुछ कहना है…


लेखक: मिन्हाज अहमद क़ासमी, चेयरमैन ऑल इंडिया सीमांचल जन विकास परिषद


जोकीहाट, अररिया बिहार! आज आप इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन आपके नाम की गूंज आज भी सीमांचल की गलियों, गांवों, चौपालों और सियासी बहसों में सुनाई देती है। आपने अपनी जिंदगी के तकरीबन छह दशक सियासत में गुजारे। सरपंच से लेकर बिहारमंत्री और केंद्र सरकार में गृह मंत्री तक का सफर तय किया। आपने वह दौर भी देखा, जब सीमांचल की आवाज़ को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाना आसान नहीं था। आपने अपनी एक पहचान बनाई, अपना एक सियासी घराना खड़ा किया और अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ी, जिससे सीमांचल के लोगों की बड़ी उम्मीदें जुड़ी थीं। लेकिन आज मेरा दिल कुछ सवालों से भरा हुआ है। कुछ शिकायतें हैं, कुछ अधूरे ख्वाब हैं और कुछ ऐसे दर्द हैं, जिन्हें शायद आपके सामने ही बयान किया जा सकता है। तस्लीमुद्दीन साहब, आपकी रूह से मुझे कुछ कहना है—आपने साठ साल में जो कमाया, क्या आपकी अगली नस्ल उसे संभाल पा रही है? हमारे यहां एक कहावत है— “घर फूटा, गंवार लूटा।” यह कहावत किसी एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि हर उस घराने के लिए चेतावनी है, जिसकी ताकत आपसी इत्तेहाद में होती है और जिसकी कमजोरी आपसी खींचतान बन जाती है। आज आपके परिवार के सियासी रिश्तों और मतभेदों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सुनने को मिलती हैं। आपके तीनों बेटों के बीच अगर मतभेद हैं, अगर सियासी रास्ते अलग-अलग हैं, अगर फैसलों को लेकर असहमति है, तो मेरा सवाल है—क्या इस विरासत का मकसद यही था?।तस्लीमुद्दीन साहब, आप तो लोगों के झगड़े सुलझाया करते थे। पंचायतों में फैसले कराते थे। बड़े-बड़े सियासी लोगों से मिलकर रास्ते निकालते थे। आज अगर आपके अपने ही परिवार में मतभेद की चर्चा हो, तो एक आम आदमी के दिल में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस शख्स ने दूसरों के विवाद सुलझाए, उसकी अपनी विरासत के सवाल कौन सुलझाएगा? मैं किसी बेटे को दोषी और किसी को बेगुनाह ठहराने नहीं बैठा हूं। यह फैसला वक्त, तथ्य और खुद संबंधित लोगों के आचरण पर छोड़ता हूं। लेकिन मेरी गुजारिश है कि अगर कहीं कोई गलतफहमी है, तो उसे दूर कीजिए; अगर कोई नाराजगी है, तो बातचीत से खत्म कीजिए; और अगर कोई सियासी महत्वाकांक्षा है, तो उसे कौम की जरूरतों से बड़ा मत बनाइए। क्योंकि विरासत केवल कुर्सी का नाम नहीं, जिम्मेदारी का नाम भी है। आपने सियासी वारिस बनाए, मगर क्या समाजी नेतृत्व भी तैयार किया? तस्लीमुद्दीन साहब, आपसे मेरी शिकायत केवल आपके परिवार तक सीमित नहीं है। मेरी शिकायत उस सियासी सोच से भी है, जिसके कारण सीमांचल की एक बड़ी आबादी आज भी अपने मजबूत, शिक्षित और स्वतंत्र सामाजिक नेतृत्व की तलाश में दिखाई देती है। आपने अपने सियासी उत्तराधिकार को मजबूत करने की कोशिश की। आपने अपने लोगों को आगे बढ़ाया, अपने करीबियों को अवसर दिए और अपने समर्थकों का एक दायरा बनाया। इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन मेरा सवाल यह है कि क्या उसी अनुपात में आपने नई पीढ़ी के ऐसे नेताओं को भी तैयार किया, जो आपके परिवार से बाहर निकलकर पूरे समाज की आवाज बन सकते? कुल्हैया समाज की आबादी, उसकी सामाजिक जरूरतों, उसकी शैक्षणिक स्थिति और उसकी राजनीतिक भागीदारी को देखते हुए यह सवाल बेहद अहम है। समाज में ऐसे लोगों की जरूरत है जो केवल चुनाव के वक्त नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, प्रशासन और सामाजिक सुधार के सवालों पर भी लगातार काम करें। दूसरे समाजों में हमें अलग-अलग स्तरों पर अनेक नेतृत्वकर्ता दिखाई देते हैं। छोटे समुदायों में भी पंचायत से लेकर विधानसभा और संसद तक अपनी बात रखने वाले लोग सामने आते हैं। फिर एक बड़ी आबादी होने के बावजूद कुल्हैया समाज में व्यापक, संस्थागत और सामूहिक नेतृत्व का सवाल बार-बार क्यों उठता है? यह सवाल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि हमारी पूरी सामाजिक व्यवस्था के सामने है। हम इमाम के बगैर नमाज नहीं पढ़ते, मगर अफसोस कि माजी जिंदगी में बगैर रहनुमा के चलने के आदी होते जा रहे हैं। मेरी शिकायत यह भी है कि आपने अस्पतालों से ज्यादा इमारतें क्यों नहीं बनवाईं? तस्लीमुद्दीन साहब, आपसे एक और शिकायत है—काश! आपने अपनी सियासी ताकत का कुछ और हिस्सा शिक्षा और स्वास्थ्य के स्थायी संस्थानों के निर्माण में लगाया होता। आपने जमीन, जायदाद और दूसरी संपत्तियां छोड़ीं। उनका कानूनी हक आपके वारिसों का है। इस पर मुझे कोई एतराज नहीं। लेकिन अगर सीमांचल में एक ऐसा अस्पताल भी बनता, जहां गरीब मरीजों को बेहतर इलाज, दवाइयां, जांच और जरूरी चिकित्सा सुविधाएं मिलतीं, तो उसकी खिदमत का दायरा किसी एक परिवार से कहीं ज्यादा बड़ा होता। अगर दिल्ली पब्लिक स्कूल जैसे आधुनिक शिक्षा मॉडल से प्रेरित एक अच्छा विद्यालय बनता, जहां सीमांचल के गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे बेहतर तालीम हासिल करते, तो कितनी जिंदगियों की दिशा बदल सकती थी! अगर एक मजबूत दारुल उलूम, आधुनिक दीनी तालीम का संस्थान या ऐसा शैक्षणिक केंद्र बनता, जहां कुरान और दीन की तालीम के साथ आधुनिक विषयों, विज्ञान, तकनीक और रोजगारपरक शिक्षा का भी इंतजाम होता, तो आने वाली नस्लों के लिए कितने दरवाजे खुलते! मेरी नजर में असली विरासत वह नहीं, जिसे देखकर लोग केवल किसी परिवार की दौलत याद करें। असली विरासत वह है, जिसे देखकर गरीब का बच्चा कहे—यहां से पढ़कर मेरी जिंदगी बदली; मरीज कहे—यहां मुझे इलाज मिला; और बेरोजगार नौजवान कहे—यहां मुझे अपने पैरों पर खड़े होने का रास्ता मिला। आपके नाम से जुड़े कुछ संस्थानों और अधूरी पड़ी योजनाओं की स्थिति को लेकर भी स्थानीय लोगों के मन में सवाल हैं। अगर कोई मदरसा अपनी तालीमी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पा रहा, अगर कोई छात्रावास उपयोग से बाहर है, या किसी स्वास्थ्य परियोजना का मकसद पूरा नहीं हो रहा, तो उनकी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। जो संस्थान जनता के हित के लिए बने हैं, उन्हें जनता के काम आना चाहिए। तस्लीमुद्दीन साहब, इमारत खड़ी कर देना एक काम है, मगर उसमें इल्म की रोशनी जलाए रखना उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी है। आपने पुल-पुलियों और दूसरी विकास योजनाओं के लिए भी कोशिशें कीं। लेकिन किसी भी परियोजना की असली कामयाबी उसकी बुनियाद रखने में नहीं, बल्कि उसके टिकाऊ होने और जनता को लगातार लाभ पहुंचाने में है। जहां निर्माण में कमी या रखरखाव की समस्या हो, वहां जांच हो, जिम्मेदारी तय हो और सुधार किया जाए।
सीमांचल को अधूरे ऐलानों से ज्यादा मुकम्मल कामों की जरूरत है। आपने नेताओं की फौज बनाई, मगर समाज को एक साझा मंच क्यों नहीं दिया? तस्लीमुद्दीन साहब, मुझे याद आता है कि आपने कई लोगों को आगे बढ़ाया। आपके साथ रहकर अनेक लोगों ने सियासत सीखी, अपनी पहचान बनाई और समाज में जगह हासिल की। लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि उस अनुभव को किसी एक परिवार या गुट की सीमा से बाहर निकालकर समाज की सामूहिक पूंजी बनाया जाए। मेरा सवाल यह है कि क्या हम ऐसा कोई मजबूत संस्थागत ढांचा बना सके, जहां नए नौजवानों को नेतृत्व की ट्रेनिंग मिले? जहां उन्हें संविधान की जानकारी हो, प्रशासन से संवाद करने का सलीका आए, बजट समझने की क्षमता पैदा हो, सरकारी योजनाओं की निगरानी करना सीखें और समाज के लिए काम करने का व्यावहारिक अनुभव हासिल करें? हमारे यहां अक्सर ऐसा होता है कि कुछ नौजवान चाय की दुकानों पर बैठकर बड़े-बड़े सियासी दावे करते हैं। वे सरकारों को बदलने और नेताओं को चुनौती देने की बातें करते हैं। लेकिन जब वास्तविक जिंदगी में किसी दफ्तर के सामने अपने समाज का सवाल रखने की बारी आती है, तो बहुत से लोग पीछे हट जाते हैं। यह केवल नौजवानों की गलती नहीं। यह हमारी सामाजिक और शैक्षणिक व्यवस्था की भी जिम्मेदारी है। हमने उन्हें बहस करना तो सिखाया, मगर दस्तावेज पढ़ना, कानून समझना, आवेदन लिखना, आंकड़े जुटाना, अधिकारियों से जवाब मांगना और लगातार संघर्ष करना कितना सिखाया?
हमें नारों से आगे बढ़कर ज्ञान, संगठन और जिम्मेदारी की संस्कृति पैदा करनी होगी। तस्लीमुद्दीन साहब, आपके अधूरे ख्वाब कौन पूरे करेगा? आपके सियासी सफर की अपनी खूबियां थीं और अपनी सीमाएं भी। संसद में सवाल उठाने का तरीका हो या सत्ता के लोगों से व्यक्तिगत संपर्क के जरिए काम निकलवाने की कोशिश—आपकी कार्यशैली पर अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन आज असली सवाल यह है कि आपके अनुभव से अगली पीढ़ी क्या सीख रही है? सियासत केवल किसी बड़े नेता से मुलाकात कर लेने का नाम नहीं है। सियासत यह भी है कि गांव में स्कूल चले, अस्पताल में डॉक्टर उपलब्ध हों, सड़क टिकाऊ बने, बाढ़ से प्रभावित परिवारों को राहत मिले, नौजवानों को रोजगार मिले और गरीब को सरकारी दफ्तर में अपना हक मांगने के लिए किसी रसूखदार की सिफारिश न ढूंढ़नी पड़े। मैं चाहता हूं कि आपकी विरासत से जुड़े लोग एक साझा विकास एजेंडा तैयार करें। परिवार के सदस्य हों या पुराने साथी, सबको बैठकर तय करना चाहिए कि अगले पांच साल में सीमांचल के लिए कौन-कौन से काम प्राथमिकता पर होंगे।
आपके परिवार में कोई सांसद बने, कोई विधायक बने, कोई संगठन चलाए—यह सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनता के फैसले से तय होना चाहिए। मगर जो भी जिम्मेदारी संभाले, वह दूसरे की राह रोकने के बजाय समाज की राह आसान करे।
अगर किसी के पास अनुभव है, तो वह नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करे। अगर किसी के पास संसाधन हैं, तो वह संस्थान बनाने में सहयोग करे। अगर किसी के पास राजनीतिक पहुंच है, तो उसका इस्तेमाल सार्वजनिक हित के लिए हो। कुर्सियां बदल सकती हैं, मगर कौम के बुनियादी सवाल नहीं बदलने चाहिए। कुल्हैया समाज को आखिर कब मिलेगा अपना मजबूत सामाजिक नेतृत्व? तस्लीमुद्दीन साहब, यह सवाल आपके परिवार से आगे बढ़कर हमारी पूरी बिरादरी से है। हम अपनी सामाजिक कमजोरियों के लिए केवल किसी एक नेता को जिम्मेदार ठहराकर मुक्त नहीं हो सकते। हमारे पढ़े-लिखे नौजवानों में से बहुत से लोग बेहतर भविष्य की तलाश में बाहर चले जाते हैं। यह अच्छी बात है कि वे तरक्की करें, लेकिन सवाल यह भी है कि अपने इलाके से उनका रिश्ता कैसे कायम रहे? वे अपने अनुभव, ज्ञान और संसाधनों से सीमांचल के लिए क्या योगदान दे सकते हैं?।हमें ऐसे शिक्षक चाहिए जो बच्चों की शिक्षा के लिए काम करें। ऐसे वकील चाहिए जो लोगों को उनके अधिकार समझाएं। ऐसे पत्रकार चाहिए जो तथ्यों के साथ जनसमस्याएं उठाएं। ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता चाहिए जो सरकारी योजनाओं की निगरानी करें। ऐसे नौजवान चाहिए जो पंचायत से लेकर जिला और राज्य स्तर तक जनता की समस्याओं पर अध्ययन करें।
और सबसे बढ़कर, हमें ऐसे रहनुमा चाहिए जो समाज को अपने पीछे चलाने के बजाय समाज को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहें। मैं कुल्हैया समाज के लोगों से भी कहना चाहता हूं कि अपनी पूरी उम्मीद किसी एक खानदान, किसी एक नेता या किसी एक चुनाव पर मत टिकाइए। अपना संगठन बनाइए, शिक्षा पर निवेश कीजिए, स्थानीय संस्थाएं खड़ी कीजिए और नौजवानों को जिम्मेदारी दीजिए। एक शायर का मशहूर शेर है— “मुत्तहिद हो तो बदल डालो निज़ाम-ए-गुलशन, मुंतशिर होगे तो मरो शोर मचाते क्यों?” यह शेर हमें याद दिलाता है कि बिखरी हुई आवाजें अक्सर अपनी ताकत खो देती हैं। इत्तेहाद का मतलब किसी एक व्यक्ति की हर बात मान लेना नहीं, बल्कि मतभेदों के बावजूद साझा उद्देश्यों पर एक साथ काम करना है।
आखिरी सवाल—आपकी रूह को सुकून किसमें मिलेगा?
तस्लीमुद्दीन साहब! आज मैंने अपने दिल की बात कह दी। हो सकता है मेरी कुछ बातों से लोग असहमत हों। हो सकता है आपकी सियासत के प्रशंसकों को मेरी शिकायतें सख्त लगें। लेकिन मेरा मकसद किसी की तौहीन करना नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाना है जो सीमांचल के भविष्य से जुड़े हैं। मैं आपके राजनीतिक योगदान को नकारने नहीं आया हूं। मैं यह पूछने आया हूं कि उस योगदान को स्थायी सामाजिक बदलाव में कैसे बदला जाए। आपकी अगली नस्ल के सामने आज एक रास्ता है—आपसी मतभेदों में उलझकर अपनी ऊर्जा खर्च करे, या आपके अनुभव से सीखकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक एकता के नए अध्याय लिखे। मेरी गुजारिश है कि अगर आपके परिवार के बीच कोई मतभेद हैं, तो उन्हें बातचीत से सुलझाया जाए। अगर आपकी कोई अधूरी योजना है, तो उसकी समीक्षा की जाए। अगर कोई संस्थान बंद या निष्क्रिय है, तो उसे फिर से जनता के काम लाने की कोशिश हो। और अगर कुल्हैया समाज में नेतृत्व का अभाव महसूस किया जा रहा है, तो नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए ठोस पहल की जाए। मैं नहीं जानता कि मरहूम तस्लीमुद्दीन साहब की रूह से शिकायत करने का मेरा यह अंदाज कितना सही है। मगर इतना जरूर जानता हूं कि जिंदा लोगों से सवाल करना हमारा हक है और आने वाली नस्लों के लिए बेहतर व्यवस्था बनाना हमारी जिम्मेदारी।
तस्लीमुद्दीन साहब, आपने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ कमाया। अब वक्त है कि उस विरासत को केवल नाम, परिवार और सियासी प्रभाव तक सीमित न रहने दिया जाए। उसे स्कूलों, अस्पतालों, पुस्तकालयों, प्रशिक्षण केंद्रों और एक जागरूक समाज की शक्ल दी जाए।
आपके नाम की सबसे बड़ी इज्जत यह नहीं होगी कि लोग हमेशा आपके परिवार का नाम लेते रहें; बल्कि यह होगी कि सीमांचल का हर गरीब बच्चा पढ़ सके, हर जरूरतमंद को इलाज मिल सके और कुल्हैया समाज का हर नौजवान अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझ सके।
अल्लाह मरहूम तस्लीमुद्दीन साहब की मगफिरत फरमाए और उनके परिवार तथा सीमांचल के लोगों को बेहतर रास्ता चुनने की तौफीक अता फरमाए।
आमीन।


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