भ्रष्टाचार पर शर्मसार झारखंड, कमीशन के किराए में कितने किराएदार





•  लेखक: दिवाकर पाठक, हजारीबाग,झारखंड

झारखंड: सूबे में कुछ माह पूर्व मनी लांड्रिंग के केस में सिंचाई व ग्रामीण विकास विभाग में कार्यरत चीफ इंजीनियर या कहें की अकूत संपत्ति के स्वामी वीरेंद्र राम की गिरफ्तारी ने भ्रष्टाचार पर झारखंड को शर्मसार कर दिया है। यह मामला तब प्रकाश में आया जब ईडी के हाथों गिरफ्तारी के बाद सरकार से वीरेंद्र राम की संपत्ति तथा उनकी ओर से जारी टेंडरों का ब्योरा मांगे जाने के बाद ग्रामीण कार्य विभाग के लगभग 50 करोड़ के ढाई दर्जन टेंडर अचानक रद्द कर दिए गए। इनकी गिरफ्तारी के बाद अन्य कोई जवाबदेही के लिए तैयार नहीं हुआ। इनके कमीशन गैंग में दो दर्जन नेताओं और नौकरशाहों के शामिल होने की आशंका जताई गई थी। गिरफ्तारी के एक दिन पहले ही ग्रामीण कार्य विभाग के मंत्री आलमगीर आलम ने भी कहा था कि वीरेंद्र नाम के खिलाफ विभागीय कार्रवाई होगी। भ्रष्टाचार के इस सौदागर ने अपने चार्टर्ड अकाउंट के माध्यम से काले धन को सफेद बनाने का प्रयास किया था। जिसके बाद ईडी को जानकारी मिली थी। इसके बाद छापेमारी में 8 महंगी गाड़ियां और 6 आलीशान बंगले मिले। इनका बेटा 35 -35 हजार रुपए की शर्ट एक बार प्रयोग के बाद उतार देता था। 300 रुपए लीटर का विदेशी पानी पीता था। काली कमाई का यह काला नमुना हम सबों के बीच प्रस्तुत है। हमें इन नमूनों की पहचान अपनी विवेकशीलता से करने की जरूरत है। इन नमूनों की पहचान से जो महत्वपूर्ण प्रश्न प्रस्फुटित हो रहे हैं,वो ये है कि क्या सूबे सरकार गहरी नींद में सोई थी? क्या विभाग के मंत्री श्री आलम को ईडी की गिरफ्तारी से 1 दिन पूर्व ही अपने चीफ इंजीनियर के माथे पर भ्रष्टाचार का टीका नजर आया,जो कार्रवाई की बात कही? क्या यह बौनी हुकूमत और भ्रष्ट नौकरशाह को परिभाषित नहीं करता? भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात करने वाली सूबे सरकार पर प्रश्न चिन्ह खड़ा नहीं होता? 
     इन सभी प्रश्नों के उत्तर का सारांश है कि सूबे में विकास के बीज बोने की बात करने वाली सरकार की पारदर्शी नीति अपारदर्शी मालूम पड़ती है। सरकार की इस कार्यकाल में प्रदेश की सवा तीन करोड़ जनता ने बड़ी ही आस लगाकर अपने भाग्योदय की उषाकाल का अवलोकन का आलोकित स्वरूप का साक्षात्कार करना चाहती थी,परंतु इस प्रकार की निराशा भरी तस्वीर को देखकर दर्द का बढ़ना तय है। अपनी तकदीर पर आंसू बहाना उनकी लाजमी है। अब ऐसे मे किन पर भरोसा रखी जाए, जब झारखंडियों के अरमानों का खंड- खंड हो रहा हो। जिन्हें पारदर्शी प्रदेश के रूप में परिणत करने की मुहर लगाई गई,आज वे अपनी जमीन से खिसकते नजर आ रहे हैं।सूबे सरकार सूबेवासियों की इस चिंता को गलत नहीं बता सकती। क्योंकि यह लोगों को सोंचने पर विवश करता है कि कमीशन के किराए में लगभग 2 दर्जन नेता और नौकरशाह किराएदार के रूप में शामिल होने की आशंका है। अकूत संपत्ति के इस काले जादूगर के यहां 8 महंगी गाड़ियां,6 आलीशान बंगले के साथ-साथ इनके बेटे द्वारा 35-35 हजार का शर्ट केवल एक बार प्रयोग करना,300 लीटर का विदेशी पानी पीना,क्या यह राज्यवासियों के हितों की हत्या नहीं है? ऐसे में राज्यवासी चिंतित नहीं होंगे,तो क्या हसेंगे? भ्रष्टाचार की यह भयानक तस्वीर वास्तव में एक गंभीर प्रश्न को रेखांकित करती है,जिसका उत्तर सूबेवासियों के लिए एक गंभीर विषय है। बताते चलें कि भ्रष्टाचार की श्रृंखला में अकेले वीरेंद्र राम नहीं हैं। ऐसे कई नाम और मिल जाएंगे, जिनकी गिनती नामचीन हस्तियों में होती है। ऐसे लोग स्वयं बड़ा बनने की चाहत में दूसरे का हक छीनने का कार्य करते हैं,जो कतई ठीक नहीं। जरा सोंचिए,एक साथ जन्म लेने वाले उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ विकास में अव्वल हैं,पर झारखंड आज तक अपनी किस्मत पर आंसू बहाता दिख रहा है। कारण है भ्रष्टाचार के बाजार में यह आज तक बिकता नजर आ रहा है। यदि आज तक भ्रष्टाचार के भंवर में न फसा होता तो इसकी सूरत राष्ट्र में रोचक होती। कहा जाता है कि जिसकी रोटी बन-बन रोए,फकीर ठोक -ठोक खाय। अर्थात् प्रचुर संपदायों से परिपूर्ण राज्य होने के बावजूद विकास के बीज का सही तरीके से अंकुरण न हो पाना,एक गंभीर नाकामयाबी को दर्शाता है। अब तक की सरकारों ने केवल अपनी कुर्सी के लिए सत्ता का उपयोग किया। राज्य से भ्रष्टाचार उन्मूलन का कोई पुख्ता कानून नहीं बनाया। यदि भ्रष्टाचार के प्रति लोगों में कानून का भय व्याप्त होता,तो इतने बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी जन्म ही न लेते। यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचारी बिल्कुल बेखौफ हैं,इसमें कहीं कोई संदेह नहीं। 
       अब हम भ्रष्टाचार की पूरी वारदात को समझने की कोशिश करते हैं। जैसे किसी परिवार का कोई बच्चा पहले दिन 1 रुपया चोरी करता है,फिर धीरे-धीरे एक बहुत बड़ी राशि को गमन कर बैठता है। इसका अर्थ हुआ कि कहीं ना कहीं वह मानसिक रूप से बेखौफ है। यदि उसे थोड़ा सा भी भय होता तो वह इतना बड़ा अपराधी न बनता। उसके इस काली करतूत के पीछे कहीं ना कहीं उसका अभिभावक कटघरे में खड़ा होगा ही और होना भी चाहिए। क्योंकि यह नैतिक जिम्मेवारी उसके अभिभावक की ही होगी। बेटे के असंस्कारी होने पर अभिभावक स्वयं को बेदाग साबित नहीं कर सकता। ठीक उसी प्रकार प्रदेश सरकार की भी यह नैतिक जिम्मेवारी बनती है कि राज्य के अंदर किसी भी प्रकार की अपराध का जन्म ही न हो। चाहें वह अपराध किसी भी श्रेणी का हो। यदि किसी कारणवश सूबे में अपराध की अग्नि प्रज्जवलित होती है तो यह निश्चित है कि हर ओर स्वाहा की ध्वनि सुनाई देगी ही। इसमें कोई संशय नहीं। ऐसे भ्रष्ट अपराधों में सरकार स्वयं को बेदाग साबित नहीं कर सकती। क्योंकि वह राज्यवासियों के अभिभावक समान है। इसलिए यह सरकार का परम कर्तव्य है कि प्रदेश में पवित्रता का ख्याल संविधान सम्यक हो। क्योंकि सरकार गठन के वक्त उनके मंत्रियों ने संविधान की शपथ जो ली है। इसका भी ख्याल पारदर्शी तरीके से रखी जाए। तभी एक सुशासनी सरकार के रूप में खुद को परिभाषित कर पाएंगे। नहीं तो भ्रष्टाचार के कलंक से कोई नहीं रोक सकता। और आप जानते हैं कि कलंक काजल से भी काली होती है। हालांकि यह अलग बात है कि भ्रष्टाचार उजागर होने पर भ्रष्टाचारी को सजा दी जाती है। पर इससे सरकार की छवि को शत् प्रतिशत सही नहीं आंका जा सकता। सरकार की छवि तभी बेदाग मानी जाएगी,जब भ्रष्टाचार या अपराध के कलंक का टीका किसी के माथे पर नजर ही ना आए और इसके लिए भ्रष्टाचार उन्मूलन के नए कानून बनाने की जरूरत है। तभी भ्रष्टाचारियों की बारात को रोका जा सकेगा। वरना!भ्रष्टाचारी तो पनपेंगे ही,इसमें कोई दो राय नहीं। 
    अब हम देश के अंदर कुछ चर्चित मुख्यमंत्रियों की सूची को देखते हैं। जैसी यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ,एमपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा आदि। सवाल उठता है कि आखिर ये मुख्यमंत्री चर्चित क्यों है? जवाब सीधा है ये अपराध पर त्वरित बुलडोजर चलवाते हैं। तभी तो अपराधी एक बार अपराध करने से सौ बार सोंचता है। मैं यहां स्पष्ट कर दूं कि मेरा मकसद बीजेपी के इन मुख्यमंत्रियों का पक्ष रखना नहीं है, बल्कि उनकी वास्तविक चरित्र को दर्शाना है। यदि अपने राज्य में भी हर बुरे कार्य पर ऐसे बुलडोजर चलने प्रारंभ हो जाएं,तो किसी की मजाल नहीं कि वह अपराध की अग्नि को प्रज्वलित कर सकें। इसके लिए राज्यहित में कानून की कड़ी को मजबूत करना अतिआवश्यक है। जरा सोंचिये,झारखंड एक अमीर राज्य होते हुए भी विकास में क्यों विफल है? जिसका जवाब हर झारखंडी को अपनी बुद्धिमता के साथ सोंचने की जरूरत है। जब तक हम राज्य हित में सही सोंच विकसित नहीं करेंगे,तब तक विकास का पूर्ण साकार स्वरूप प्राप्त नहीं हो सकेगा। इसलिए सरकार अपनी पारदर्शी नीति का प्रयोग करे और प्रदेश वासी अपनी उचित निर्णायक क्षमता का। तभी एक स्वच्छ प्रदेश की नींव रखी जा सकेगी। 
    सारांश है कि जब तक ऐसे भ्रष्टाचारी नौकरशाह रहेंगे तब तक राज्य को रंक बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। क्योंकि इनके कमीशन के किराए में दो दर्जन नेता और नौकरशाहों के किराएदार के रूप में होने की आशंका जताई जा चुकी है। ऐसे में सरकार पर सवालिया निशान लगना तो तय है। सरकार की छवि तो बिल्कुल पारदर्शी होनी चाहिए, जिससे कि चुनाव के वक्त जनता बिन मांगे वोट कर सके। छवि यदि अच्छी है तो हर हाल में जनता आपको ही वोट करेगी। हां इसके लिए जरूरी है जनता और राज्य हित में नीति निर्देशक तत्वों का पालन सच्चाई के साथ की जाए। तभी जनता और सरकार के बीच सेतु निर्माण का कार्य आसानी से हो सकेगा। इसके लिए जाति,धर्म और वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठना होगा। हर वर्ग,समुदाय सरकार से खुश रह सके ऐसी मनमोहक तस्वीर प्रस्तुत करनी होगी। क्योंकि जनता अब जागृत अवस्था में रहती है। वह सुसुप्त अवस्था से ऊपर उठ चुकी है। इसलिए ऐसी सुरक्षा कवच विकसित की जाए,जिससे राज्य हित आसानी से हो सके। कुल मिलाकर सरकार का मुख्य कार्य है जनता के हितों की रक्षा करना। इसलिए समतुल्य नजरिए से निर्देशन जारी रखी जाए। तभी आपकी छवि स्वच्छ हो सकेगी।

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