दूरसंचार से दूर झारखंड



आलेख : दिवाकर पाठक, हजारीबाग(कंडाबेर), झारखंड। Email: newsincharge@gmail.com)

 • दूरसंचार से दूर झारखंड

रांची/ हजारीबाग : झारखंड जहां एक ओर विशाल खनिज संपदाओं से परिपूर्ण होते हुए, अपने मनोरम दृश्य से देश और दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करता है। वही विडंबना है कि सूबे के 970 गांव आज भी दूरसंचार से दूर हैं। मोबाइल क्रांति के इस युग में जहां एक ओर सारे काम डिजिटल तरीके से हो रहे हैं। वहीं प्रदेश के इन गांवों को दूरसंचार सेवा से अपूर्ण रहना एक गंभीर चित्र को चित्रित करता है। जरा कल्पना करें,इन गावों में रहने वाले ग्रामीणों को कितनी कठिन परेशानियों का सामना करना पड़ता होगा। देखा जाए,तो आज भी उनका जीवन पाषाण कालीन सभ्यता के समान है। जरा गौर करें,यह तरक्की की कैसी तस्वीर है जो आज तक अपने विकास की फरियाद लिए खड़ा है। 22 वर्ष के इस युवा झारखंड में बदहाली की ऐसी तस्वीर हमें एक ओर सोचने को मजबूर करती है। कनेक्टिविटी नहीं होने के कारण लोगों को मोबाइल से बातचीत करने के लिए दो-तीन किलोमीटर दूर दूसरे गांव जाना पड़ता है। सबसे ज्यादा दिक्कत विद्यार्थियों को ऑनलाइन क्लास के दौरान झेलना पड़ता है। इ-पॉश काम नहीं करने के कारण यहां राशन अपवाद रजिस्टर के माध्यम से लाभुकों को दिया जाता है। हालांकि इन गांवों में मोबाइल सुविधा बहाल करने को लेकर भारत नेट की दो योजना के तहत काम शुरू किया गया है। पहली योजना के तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्र व आकांक्षी जिलों के तहत आने वाले गांवों में नेटवर्क के लिए टावर लगाए जा रहे हैं। इसमें 82 टावर लगाए जाएंगे। और 90 गांवों को कवर किया जा सकेगा। इसका काम मार्च 2023 तक पूरा हो जाएगा। दूसरी योजना के तहत उन गांवों में सर्वे किया गया है,जो ना तो नक्सल प्रभावित क्षेत्र में आते हैं और ना ही आकांक्षी योजना के तहत। अब हम बीएसएनएल के प्राप्त आंकड़ों से जिलों में मोबाइल कनेक्टिविटी की तस्वीर को प्रस्तुत करते हैं। 

*जिला* *गांव* *सुविधा नहीं*
गुमला 942 89
लातेहार 749 83
चतरा 1377 74
सिमडेगा 449 73
पलामू 1711 60 
गड़वा 844 52
खूंटी 754 51
हजारीबाग 1193 34
कोडरमा 577 27
लोहरदगा 352 25
रांची 1296 6

इन तस्वीरों से उद्धृत सवाल हमें पूर्वकाल की बदहाली की ओर ले जाता है। इसे बड़ी ही गंभीरता से समझने की जरूरत है। यहां एक गंभीर प्रश्न है कि आखिर झारखंड नवनिर्माण के इतने लंबे अरसे तक दूरसंचार से क्यों दूर है ये गांव? जवाब बिल्कुल स्पष्ट है कि अब तक की सरकारों ने अपने दायित्वों की दृष्टि नहीं दिखलाई इन गांवों की ओर। चाहें किसी भी पार्टी की सरकार रही हो। जहां तक दूरसंचार विकास का सवाल है,सभी सरकारें अपनी नींद सोती रहीं। तभी तो इतने लंबे कालखंड तक विकास के बीज नहीं बोए गए। फलस्वरूप ये ग्रामीण आज तक अपनी कमी को कोसते नजर आ रहे हैं। यदि ईमानदारी पूर्वक सरकारों द्वारा इन पर ध्यान दिया जाता तो आज इन्हें परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता। जरा गौर करें,आखिर इतनी बड़ी अनदेखी क्या बयां करती है? जवाब बिल्कुल सीधा है। कर्तव्य पथ पर चलने की जगह,राजपथ पर चलना। अर्थात्, केवल राजनीतिक गणित के प्रश्नों को ही हल करना। बाकी को अपनी दशा में ही छोड़ देना। इसे राजनीतिक पार्टियों के चुनावी चश्मे से देखें,तो यह है कि केवल राजनीतिक समीकरणों को चिन्हित कर अपने स्वार्थ के चित्र को प्रस्तुत करना। मतलब चुनाव जीतने के लिए तो हम अपनी पूरी ताकत झोंक डालते हैं। पर यदि राजपथ की जगह अपने कर्तव्य पथ का अनुसरण करते हुए इन गांवों के विकास के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी जाती तो क्या इनकी सूरत विकास की मूरत के रूप में आज तब्दील न हुई होती। बात बिल्कुल स्पष्ट है कि पूर्व काल की सरकारों ने सही तरीके से इस पर अपनी दृष्टि ही नहीं दिखलाइ। हमें स्वार्थहीत की पराधीनता से बाहर निकलना होगा। तभी विकास के बीज संपूर्ण राज्य में एक साथ अंकुरित होंगे। इसके लिए विकास के रहनुमाओं को समदृष्टि अपनानी होगी। एक उदाहरण द्वारा इसे बड़ी ही आसानी से समझा जा सकता है। हमारे प्रधानमंत्री जी ने हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ कर दिया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि हम स्वयं को राजा समझकर राजपथ पर चलेंगे तो हमारी सोच संक्रमित होगी ही। इससे हमारी दृष्टि में दोष आना स्वाभाविक है। इसलिए हम स्वयं को राजा ना समझते हुए केवल अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए प्रतिबद्ध रहें। इसीलिए उन्होंने राजपथ को बदलकर कर्तव्य पथ कर दिया। ताकि हम समदृष्टि की भावना से ओतप्रोत होकर अपने कर्तव्य के चित्र को प्रस्तुत कर सकें। यदि अपने कर्तव्य से भटक रहे हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि हम आज भी गुलामी की बेड़ियों में बंद हैं। हमें हर हाल में इससे बाहर निकलना होगा। तभी कर्तव्य परायणता की पृष्ठभूमि तैयार हो पाएगी। वरना! आरोप-प्रत्यारोप के इस बाजार में हम स्वयं को खोते नजर आएंगे। इसलिए पराधीनता की इन बेड़ियों को तोड़ते हुए विकास के नए बीज बोए जाएं,ताकि संपूर्ण राज्य वासी एक रेखा में रेखांकित हो सके। ऐसा नहीं कि कोई सारी सुख सुविधाओं से लैस हो और कोई अभाव के आंगन में जीवन जीने को मजबूर हो। केवल हर जगह राजनीति को जगह नहीं मिलनी चाहिए। बल्कि सच्चे अर्थ में वास्तविकता की ही वकालत करनी चाहिए। तभी हमारी छवि स्वच्छ हो पाएगी। कुल मिलाकर सारांश है कि अपने दायित्वों से दूर ना हों। बल्कि संपूर्ण विकास के बीज मंत्र से दीक्षित हों। इसके लिए राज्य की वर्तमान सरकार को चाहिए कि संपूर्ण सूबे में कहां-कहां किन-किन चीजों की कमी है,उसकी लिस्ट तैयार कर समाधान के उपाय अपनाएं जाएं। ताकि कोई वंचित न रह सके। इससे सरकार की छवि व्यापक होगी और विकास का बिगुल भी बनेगा। क्योंकि जनता बड़ी ही उम्मीदों के साथ सरकार का चुनाव करती है। और यदि ऐसे में उनकी विश्वासों की हत्या हो जाए तो सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह खड़े होंगे ही। इसलिए सरकार को चाहिए कि अपनी विधि व्यवस्था की ऐसी वीणा बजाए जिससे सूबेवासी सुकून की सांस के साथ मंत्र मुक्त होकर जीवन व्यतीत कर सकें। इससे सरकार के साथ-साथ राज्य की भी गरिमा गौरान्वित होगी और परेशानियों का अंत भी।


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